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Saturday, July 25, 2009

हमारा नजरिया- २००८-०९|| HAMARA NAZARIYA 2008-09

हमारा नजरिया- २००८-०९


प्यारे साथियों,
एक लम्बी प्रतीक्षा के बाद आखिर आज समय आ ही गया "हमारा नजरिया" कार्यक्रम के तहत एकत्र किये गये आंकड़ों का खुलासा करने का। "हमारा नजरिया" कार्यक्रम के बारे में आप सभी जानते ही हैं फिर भी हम इसका छोटा सा परिचय देना चाहते हैं -
" यह कार्यक्रम पीजीडीसीए सोसाइटी की ओर से चलाया गया था जिसमें एक प्रपत्र पर पीजीडीसीए सोसाइटी के सभी सदस्यों से उनके द्वारा बिताये गये एक वर्ष के तजुर्बों को लिखने का अनुरोध किया गया था। इसमें सभी साथियों ने बढ़चढ़ कर पूरे उत्साह के साथ भाब लिया जिसके लिए सोसाइटी उनकी आभारी है।"

"हमारा नजरिया" के परिणामों की शुरूआत हम करते हैं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों से। शिक्षणेत्तर कर्मचारी वे होते हैं जो कि हमारी कक्षा में आकर हमें शिक्षा प्रदान नहीं करते, वरन बाहर से ही हमारा पूरा सहयोग अपनी शिक्षणेत्तर गतिविधियों के माध्यम से करते हैं। शिक्षक वर्ग के अतिरिक्त समस्त स्टाफ इसी श्रेणी में आते हैं।

हमारा नजरिया कार्यक्रम से बटोरे गये आंकड़ों के अनुसार शिक्षणेत्तर कर्मचारियों में सबसे लोकप्रिय रहे हैं .......... श्री धर्मेन्द्र सर, पुस्तकालयाध्यक्ष, सेन्टर आफ कम्प्यूटर एजूकेशन, इन्टीट्यूट आफ प्रोफेशनल स्टडीज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद।

धमेन्द्र सर, एक ऐसा नाम जिसे लेते ही सदैव प्रसन्न रहने वाला एक चेहरा उभर कर सामने आता है। धर्मेन्द सर ने छात्रों के हृदय में जो यह स्थान बनाया है उसके पीछे उनका छात्रों के प्रति स्नेह, सहृदयता, उदारता का व्यवहार ही रहा है। इस बात से उन अध्यापकों को शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए जो कि यह सोचते हैं कि छात्रों को अनुशासन में रखने का एकमात्र साधन उन्हें डांटना-डपटना (भौकाल टाइट) करना ही है।

हमारे पुस्तकालय में लगभग काम की सभी पुस्तकें उपलब्ध हैं। व्यवस्था बड़ी ही अच्छी है और जरूरत के समय किताबें आसानी से उपलब्ध भी हो जाती हैं। इतने बड़े पुस्तकालय को अकेले धर्मेन्द्र सर ही सम्भालते हैं, यही उनकी काबिलियत की बेजोड़ मिसाल है। कभी-कभी धर्मेन्द्र सर भी अपने आपको भौकाली दिखाने का प्रयास करते थे, थोड़ा गुस्सा भी दिखाते थे, और थोड़ा सा डांटते भी थे, .... लेकिन यह सब बनावटी होता था और कुछ ही मिनट में उनका गुस्सा गायब हो जाता था और फिर वही प्रसन्न चेहरा आंखों के सामने होता था।

कई सदस्यों ने पुस्तकालय की प्रशंसा में यहां तक लिखा है कि "यदि ऐसा पुस्तकालय और पुस्तकें उपलब्ध कराने वाले धर्मेन्द्र सर न होते तो शायद हमारा पीजीडीसीए कर पाना लगभग असम्भव था।" सचमुच पीजीडीसीए करने वाले छात्रों के लिए पुस्तकालय उनके घर की तरह था। जिस प्रकार किसी छोटे बच्चे को अपने घर में अपनी मां की गोद में सबसे अधिक सुकून मिलता है उसी प्रकार पीजीडीसीए सोसाइटी के सदस्यों को लाइब्रेरी में पहुंचकर सुकून मिलता था। जब भी कोई छात्र किसी विषय टापिक को लेकर परेशान होता था या उसे किसी टापिक के बारे में सामग्री नहीं मिल रही होती थी तो वह अपनी समस्या धर्मेन्द्र सर से कहता। बस फिर क्या... धर्मेन्द्र सर तुरन्त उस समस्या के समाधान के रूप में कोई न कोई किताब पकड़ा देते। यह उनके किताबों, उनके विषय तथा तीक्ष्ण स्मरण शक्ति का ही परिचायक है।

शिकायत सुझाव : ऐसा नहीं है कि सभी सदस्यों ने पुस्तकालय एवं पुस्तकालयाध्यक्ष को सर्वोत्तम ही बताया हो कुछ सदस्यों ने इसकी कमियों को भी इंगित किया है जो इस प्रकार हैं-

१. पीजीडीसीए छात्रों को एक बार में एक ही पुस्तक घर ले जाने के लिए दी जाती है। छात्रों का सुझाव है कि कम से कम दो पुस्तकें घर ले जाने के लिए निर्गत की जानी चाहिए और यदि विभाग चाहे तो इसके लिए छात्र अतिरिक्त शुल्क देने को भी तैयार हैं।
२. पुस्तकों को गन्दी होने से बचाने के लिए कड़ा रुख अपनाना जरूरी है। कई छात्र पढ़ते समय पुस्तकालय की किताबों में कुछ निशान लगाते चलते हैं या पुस्तकों पर कुछ लिख देते हैं। ऐसी पुस्तकों को जब दूसरा छात्र पढ़ता है तो बार-बार उसका ध्यान भंग होता रहता है।
३. कुछ छात्र पुस्तकें निर्गत कराके उनका फोटोस्टेट कराते हैं। अक्सर देखा गया हरूै कि मोटी किताबों का फोटोस्टेट कराने से उनकी बाइंडिंग खुल जाती है और पन्ने अलग-अलग हो जाते हैं। इस तरह पन्ने खोने और पुस्तक के अनुपयोगी हो जाने का भय बना रहता है। अत: जब छात्र पुस्तक वापस करें तो पुस्तक की सतर्क जांच अवश्य की जानी चाहिए और यदि कुछ कमी मिले तो यथोचित दण्ड का प्राविधान किया जाना चाहिए।
४. आज के समय में बहुत सी किताबें सपोर्टिंग सीडी के साथ आती हैं। पुस्तकालय में इन सीडी को रखने एवं अलग से निर्गत करने की व्यवस्था होनीच चाहिए। अक्सर किताबों के साथ सीडी संलग्न न होने से छात्रों को परेशानी होती है।
५. चूंकि अब एमसीए, पीजीडीसीए, बीसीए, डीआईटी आदि अनेक कोर्स संचालित होने से बैचों एवं छात्रों की संख्या बढ़ गयी है। अत: लाइब्रेरी में धर्मेन्द्र सर को कुछ सहयोगी स्टाफ उपलब्ध कराये जाने चाहिए जिससे कि हमारी लाइब्रेरी और बेहतर हो सके।
६. यदि लाइब्रेरी का कम्प्यूटरीकरण हो जाय तो क्या कहने....। इस कार्य में विभाग पर कोई अतिरिक्त व्ययभार नहीं आयेगा। विभाग के पास पर्याप्त कम्प्यूटनर हैं ही जहां तक लाइब्रेरी के साफ्टवेयर की बात है तो उसे तो यहां के छात्रों की टीम के द्वारा अध्यापकों के कुशल निर्देशन में प्रोजेक्ट के रूप में बनवाया जा सकता है। इस तरह के प्रयोग कई विश्वविद्यालयों मे ंकिये गये हैं और काफी सफल भी रहे हैं।

यहां हम अपने सार्थियों के वक्तव्य को प्रस्तुत कर रहे हैं जो उन्होंने अपनी लाइब्रेरी और लाइब्रेरियन के बारे में व्यक्त किये हैं। हमारे साथियों ने वक्तव्य नाम न छापने की शर्त पर ही दिये हैं इसलिए हम वक्तव्य के साथ नाम छापने में असमर्थ हैं -
१. "लाइब्रेरी में व्यवस्था अच्छी है और धर्मेन्द्र सर की बात ही अलग है।"
२. "लाइब्रेरी से ज्यादा लाइब्रेरियन मस्त हैं"
३. "एक विषय पर अधिकांशत: तीन या चार प्रकाशन की किताबें ही मौजूद हैं जो कि पर्याप्त नहीं है"
४. "काफी सहयोग मिला एवं पुस्तकें उपलब्ध"
५. "लगभग सभी आवश्यक पुस्तकें उपलब्ध"
६. यहां की लाइब्रेरी में सारी किताबें उपलब्ध हैं लेकिन एक किताब ही एक समय पर घर ले जाने को मिल पाती है लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए, कम से कम दो पुस्तकें तो मिलनी ही चाहिए। हमारी लाइब्रेरी शोलगुल से परिपूर्ण होती है अन्य जगहों के पुस्तकालय की तुलना में"
६. "सबसे बढ़िया कुछ है तो हमारी लाइब्रेरी"
७. "पुस्तकालय अच्छा है सभी किताबें समय से मिल जाती है। बस कभी-कभी शोर करने पर धर्मेन्द्र सर से डांट भी पड़ जाती है"
८. "काफी अच्छा है, चूंकि मैंने लाइब्रेरी कार्ड नहीं बनवाया है इसलिए ज्यादा कुछ नहीं कह सकती"
९. "पुस्तकालय यानि किताबों का संग्रह। हमारे यहां किताबों का संग्रह तो काफी है। यहां पढ़ने के लिए जरूरत भर की किताबें मिल जाती हैं। और अधिक पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाता कि दूसरे किताब की तरफ ध्यान जाये....."
१०. "किताबें तो हैं पर उनकी सपोर्टेड सीडी नहीं है, कुछ किताबों के अच्छे संस्करण निर्गत नहीं होते हैं"
११. "पुस्तकालय में जितनी जरूरत की किताबें हैं मिल ही जाती हैं, धर्मेन्द्र सर मेहरबान हैं"
१२. "धर्मेन्द्र सर की उदारता, किताबों की सहायता, साथियों का अपनापन"
१३. "पुस्तकालय में किताबें तो उपलब्ध हैं लेकिन एक समय पर कई विद्यार्थियों को एक ही लेखक की किताबें नहीं मिल पातीं, किताबों की संख्या सीमित है"
१४. "पुस्तकालय तो अच्छी है, सभी पुस्तकें उपलब्ध रहती हैं, पर मैने कभी कोई पुस्तक निर्गत नहीं करायी, क्योंकि मुझे मेरी दोस्तों से पुस्तकें मिल जाती हैं और ज्यादा पढ़ती भी कहां हूं। मेरी दोस्ते हैं न मुझे समझाने के लिए"
15. "Librarian is better than Library"
16. "Full of Books but none of my use"
17. "Very supportful for me and every time helped me."
18. "Unfortunately but sometimes i found number of books are less than the number of students."
19. "Only library teacher is good."
20. "I feel comfort. It was nice place to study and jokes too."

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